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Mumbai, Maharastra, India
I have lost myself so until I find him within me there is nothing about me that can be written.
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Sunday, February 6

थोड़ी सी

छूट गए हैं दोस्त मेरे; थोड़े से
रूठ गया हू मै भी उनसे; थोडा सा 

थोड़े से दोस्ती टूट गई हैं ज़िन्दगी के जद्दोजहद में
और थोड़े दोस्त छूट गए हैं कटुवचनों से, जो डूबे थे सहद में

थोड़ी सी दोस्ती छूट गयी है स्टेशन के रास्ते की उन अटखलियों में
और थोड़ी छुटी कॉलेज के उन गलियों में

थोड़ी सी दोस्ती छूट गयी है मेरी नाकामी से,
और थोड़े दोस्त टूट गए हैं नए दोस्तों की हामी से

थोड़ी टूटी बनाने को नए जिस्मानी रिश्ते
और थोड़ी छुटी भरने को लोन की वो किश्ते

थोड़े से दोस्त छूट गए मेरे हट से
और थोड़ी दोस्ती टूटी एकाएक फट से

महंगाई से दौड़ में, बस दोस्ती लगे है हमें सस्ती
तोड़ दिया हमने बनाने को अपनी अलग एक हस्ती



Monday, March 29

तलब लगी है


तलब लगी है, सांस लेनी है ढूँढ रहा हु |
भागा नहीं, हाफ्फ़ रहा हु |
पसीना भी आने लगा है अब,
कोई तिंका ही सही सहारा ढूँढ रहा हु |
कहा तक भागू,
कोई तो मिले जिसे पकड़ कर रुक सकू, शायद रो सकू |

अँधेरा,
मेरी सांसे हफ्ते हुए,
धड़कने बढ़ते हुए,
ये क्या हुआ, तलब बढ़ रही है अब |

मैंने कैसे ऐसा होने दिया,
खुद के लिए एक निकृष्ट नपुंसक सी भावना आ रही है |
अपने आँखों के सामने मैंने उसे कैसे जाने दिया,
अब वह कभी नहीं मिलेगी,
बस यही तक था सब, यह मैंने क्या किया |

 बस हफ्ते भर पहले उसके जन्मदिवस पर फूल भेट किये थे,
वोह फूल सूखे ना होंगे अब तक |
अब तो कहाँ तक दौड़ा, मालूम नही,
हाफ़ और ज्यादा रहा हु,
बस किसी चीज़ की तलब लगी है |
वह मिल जाये,
मै ठीक हो जाऊ|

अब तो ढूँढने पे भी साँसे नहीं मिल रही है,
भागते-भागते मै अँधेरे में जैसे रुक सा गया |.
हाफ़ अब भी रहा हु,
तलब तो चरम सीमा पर है अब| .

थोड़ी सी रौशनी,
सामने से कुछ आता हुआ |
नजदीक आता गया,
मै खड़ा हु, कोई तो दिखा,
शायद इससे पकड़ कर रो लू |
दो आंसू बहे  तो  मन हल्का हो जाये,
शायद तलब कम हो जाये |

वह अब बोहत करीब आ गया है |
मुझे  बस रौशनी दिखाई दे रही है |
मेरी नींद खुल गयी, और मै शायद कल बत्ती जलते हुए छोड़ के ही सो गया | .

प़र तलब अब भी है,
सांसे अब भी तेज़ है,
मतलब मै सच में हाफ रहा हु |
क्या करू किमकर्तव्यविमूढ़ सा हो गया हु |
आस पास देखा, कल लैपटॉप चालू छोडके ही सो गया था |
झट-पट उठके लिखने लगा |

मैंने एक सपना देखा, मेरी २ साल की ………………. छोड़िए बस एक सपना देखा, पर तलब अब भी है |
 



किमकर्तव्यविमूढ़   : क्या करू क्या ना करू की परिस्थिति|


Saturday, October 10

अन्जाम



साले हम ही छूट गए पीछे,

बाकि सब आँखे मीचे, ऐश में;

मेरे नज़रो के नीचे ,

नर्म गोश्त के मज़े लूटते,

नदीम बनके हमसे आदिल पूछते

( नदीम: दोस्त, आदिल : सही-ग़लत )



हम भी जान के नामालूम बने है बैठे

रुतबे के गरम जोश में,

चढी हुई डगमगाती होश में,

आधी आधूरी किसी फिरदौस में,

अपने उन्ही वीरानियों के आगोश में,

साले हम ही छूट गए पीछे |

( फिरदौस: जन्नत )



फासला अब शायद बढ़ता जाएगा,

लोग दूर, और मेरा अहम करीब आएगा,

गिरते चढाते पैमोनो पर रिश्ते तौले जाएंगे

कराह कर हर शक्स को वो अपना दुखरा सुनाएंगे |



अज़ नसिहतों की एक दौड़ चलेगी

हर्फ़-हर्फ हमारे दिल को चुभेगी,

येही हमारे इश्क का होगा अन्जाम,

पीछे छूटते रिश्तों में फिर जुडेगा हमारा भी नाम |

( अज़: फिर ,हर्फ़-हर्फ़: शब्द के हर अक्षर )


Sunday, August 30

बारिश

आज फिर बारिश में कोई रो रहा होगा,
और कही इसी बारिश में कोई ठिठो रहा होगा|
कही दूर, इसी बारिश में किसी को इश्क भी हो रहा होगा|

बारिश तो एक है,
लोग निकालते मतलब अनेक है|
मै सोचता हु,
मेरी बर्बादी पे शायद जन्नत भी रो रहा होगा|

Wednesday, August 26

मृत्युदान



हे माँ तेरी गोद में सर रखकर सोना चाहता हु मै,
ज़िन्दगी के ग़मों को तेरी ममता की छामें खोना चाहता हु मै,
आज मत रोक तू माँ, जी भर रोना चाहता हु मैं|

क्या बचपन था वो,
जब हर ठोकर पर तू मुझे थी समहलती,
हर गलती पर तू , मुझे थी सवारती,
गुस्सा जाता था मै पर हर बार तू मुझे थी मनाती|

क्या बचपन था वो जब हर राह,
तू मेरे साथी चलती|

बता ना माँ क्या हुई है मुझसे आज गलती,
जो तू नही है मेरे साथ,
किसका थामू मै आज हाथ|
घोर है अँधेरा, काली है रात,
किस ओर चालू मै,
किसकी सुनु मै आज बात ?

चुप क्यों है माँ तू बता ना कौन देगा मेरा साथ,
कौन सुनेगा मेरे दिल की बात|

हे माँ अब आजा तू तेरी गोद में सो जाता हु मै,
जिंदगी छोड़ तेरी ममता के छामें खो जाता हु मै,
आज मत रोक माँ आखिरी बार आज सो जाता हु मै|

सुन आज आधी नींद से मत जगाना,
सपने में कही दूर है मुझे जाना,
आज तुझे ही तो हैं मुझे रास्ता पार करवाना|

आज तुझे हे तो है मुझे मृत्युदान देना...
आज तुझे हे तो है मुझे मृत्युदान देना...


Tuesday, August 25

.....कैसा यह लोकतंत्र .....


गया चुनाव है

बिक रहा हर गाँव है

हर जगह तनाव है ..




वोटो की लूट है

किसका वादा झूठ है

क्या गठबंधन अटूट है





बट रहा शराब है

काले धन का ब़स बहाओ है

क्या गाँधी का यह ख़ाब है




नेताओ की जेब हरी

आज चमचो की जेब भरी

पर पब्लिक है डरी डरी



यह कैसा लोकतंत्र, कैसा यह चुनाव है

जनता चाहती बदलाव है

कौन है इसका ठेकेदार, है कोइ जिम्मेदार

बातों के सब ब़स शेर है,

ज़िम्मेदारी दो तो ढेर है

तो कैसा ये लोकतंत्र, कैसा ये चुनाव है ...

कैसा ये लोकतंत्र, कैसा ये चुनाव है ||